11000 Litres Milk Offered In Narmada River: 21 दिवसीय महायज्ञ का भव्य समापन

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By Santulan News

  • समय: 18 मार्च से 7 अप्रैल तक 21 दिन चला महायज्ञ
  • स्थान: मध्यप्रदेश के सीहोर ज़िले के सतदेव गांव स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर।
  • संचालक: संत धूनीवाले दादाजी (शिवानंद महाराज) ने महायज्ञ का संचालन किया।
  • प्रमुख सामग्री: कुल 41 टन सामग्री (घी, मेवे, सोना-चांदी, औषधीय जड़ी-बूटियाँ आदि) का उपयोग किया गया।
  • समापन पर अभिषेक: अख़िर में करीब 11,000 लीटर दूध से माँ नर्मदा का अभिषेक किया गया।

सीहोर जिले के सतदेव गांव में बुधवार को 21 दिवसीय महायज्ञ का भव्य समापन हुआ। पूजा-अर्चना की परंपरा अनुसार शिवानंद महाराज के नेतृत्व में श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा को करीब 11,000 लीटर दूध से अभिषेक किया। यह आयोजन 18 मार्च से 7 अप्रैल तक चला, जिसमें नियमित रूप से शिव महापुराण और दुर्गा पाठ का निरंतर आयोजन हुआ। महायज्ञ में 151 साधुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार करते हुए पूजा-अर्चनाएं संपन्न कीं।

समापन के दिन सुबह-सुबह टैंकरों से दूध नदी के किनारे लाया गया और पाइप के माध्यम से नदी में बहाया गया। आयोजकों ने बताया कि यह दूध अर्पण परंपरा नदी के पानी को शुद्ध रखने और नर्मदा परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों की भलाई के लिए की गई है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और उन्होंने श्रद्धा से इस अनूठे दृश्य को देखा। शिवानंद महाराज के अनुयायियों का कहना है कि ‘बाबा’ (शिवानंद महाराज) को नर्मदा को माता का दर्जा है, इसी आस्था से यह अभिषेक किया गया।

आयोजकों ने यह भी बताया कि पूरे महायज्ञ के दौरान विशाल पंडाल लगाकर आयोजन किया गया। उनके अनुसार पांच एकड़ में फैले पंडाल में प्रतिदिन हजारों भक्त शामिल होते थे। इस पूरे 21 दिवसीय यज्ञ में कुल 41 टन सामग्री डाली गई, जिसमें घी, मेवे, ड्रायफ्रूट के साथ सोना-चांदी और औषधीय जड़ी-बूटियाँ भी शामिल थीं। यज्ञ के अंत में शिवानंद महाराज ने 11 हजार लीटर दूध से मां नर्मदा का अभिषेक किया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

जहां एक ओर यह आयोजन आस्था का प्रतीक बना, वहीं दूसरी ओर संसाधनों के उपयोग को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतनी मात्रा में दूध को नदी में बहाने की क्या आवश्यकता थी। आलोचकों ने कहा कि इस दूध को भूखे बच्चों के भोजन में लगा सकते थे, जबकि कुछ ने पर्यावरणीय जोखिम की चिंता जताई है। वास्तव में विशेषज्ञों का कहना है कि दूध नदी में घुलकर उसके ऑक्सीजन स्तर को प्रभावित कर सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञ हिमांशु ठाक्कर के अनुसार, “दूध को पचाने में बहुत अधिक ऑक्सीजन लगेगा, जिससे बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) में भारी वृद्धि होगी”। इसका मतलब है कि नदी में सूक्ष्मजीव दूध को तोड़ने में ऑक्सीजन खींच लेंगे और पानी की पारदर्शिता बहुत गिर जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह अचानक ऑक्सीजन की कमी से मछलियों की मौत तक हो सकती है।

इसी प्रकार एक टिप्पणीकार ने ट्वीट किया कि दूध में कच्चे सीवेज की तुलना में करीब 300 गुना ज्यादा BOD होता है, इसलिए 13,000 लीटर दूध नदी में बहाने से मछलियों को खिला नहीं, बल्कि गला घोटना होगा। पर्यावरण-सामाजिक कार्यकर्ता हंसराज मीणा ने भी सवाल उठाया कि जब राज्य में लगभग 10 लाख बच्चे कुपोषण झेल रहे हैं, तो इतने कीमती दूध को नदी में बहाना उचित है या नहीं।

11000 litres milk offered in Narmada river, सतदेव महायज्ञ धार्मिक आस्था का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन सिद्ध हुआ, जिसमें बहुत श्रद्धा के साथ मां नर्मदा के पूजन परंपरा निभाई गई। लेकिन इस आयोजन ने संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और पर्यावरण संरक्षण की बहस को भी गति दी है। आयोजन के आयोजकों ने इसे धार्मिक विश्वास और जनकल्याण से जोड़ा है, जबकि विशेषज्ञ और जनमानस इसे पर्यावरणीय दृष्टि से चिंतास्पद कह रहे हैं।

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