आपातकाल के 50 साल : आखिर क्यों लगानी पड़ी थी इमरजेंसी, किस कारण रद्द हुआ था इंदिरा गांधी का चुनाव, पढ़े पूरी खबर…

Photo of author

By Puspraj Singh

आपातकाल के 50 साल: 25 जून सन 1975 जिसे आज भी भारतीय लोकतंत्र की काली रात के रूप में याद किया जाता है। जहां से शुरुआत हुई एक काले अध्याय की जिसने लगभग 21 महीनों तक भारत में लोकतंत्र को जकड रखा था। शुरुआत हुई ऐसे समय की jजिसने देश के लोकतंत्र को खत्म कर पूरे देश को आपातकाल की ज़जीरों जकड़ लिया गया था। उस समय बड़े राजनेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया।भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 एक ऐसा दिन बन गया जब लोकतांत्रिक व्यवस्था को झकझोरते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल (Internal Emergency) की घोषणा कर दी। यह आपातकाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत लागू किया गया और करीब 21 महीनों तक, यानी मार्च 1977 तक देश में रहा।

क्यों लगा आपातकाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (12 जून 1975):

1971 के आम चुनाव में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी ने जीत दर्ज की थी।उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार राजनारायण ने उनके चुनाव को अदालत में चुनौती दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी मानते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया। उन्हें 6 साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया।इस फैसले से इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री की वैधता पर सवाल उठ गया।

जेपी आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता:

जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन बिहार से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। उन्होंने सरकार को “अलोकतांत्रिक और भ्रष्ट” बताकर प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की। छात्र, युवा, मजदूर, किसान सभी आंदोलन में शामिल हो गए। जेपी ने सेना और पुलिस से “अनैतिक आदेश न मानने” की अपील की — जिसे इंदिरा गांधी ने राज्य के खिलाफ विद्रोह समझा।

व्यापक असंतोष और विरोध प्रदर्शन:

बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकारी दमन के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर रही थी। जगह-जगह हड़तालें, धरने, प्रदर्शन हो रहे थे। इंदिरा गांधी को डर था कि इस तरह सरकार पर से नियंत्रण खत्म हो जाएगा।

सत्ता बचाने की रणनीति:

इलाहाबाद कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना पड़ सकता था। लेकिन उन्होंने सत्ता छोड़ने की बजाय संविधान में मौजूद आपातकाल की व्यवस्था का सहारा लिया। यह कदम उनके राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के रूप में देखा गया।

इमरजेंसी में क्या क्या हुआ

रातोंरात हुई गिरफ्तारियाँ

इमरजेंसी की घोषणा होते ही रातभर दिल्ली, मुंबई, पटना, अहमदाबाद और अन्य बड़े शहरों में विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हो गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित सैकड़ों नेताओं को हिरासत में लिया गया ।जेलों के बाहर सुरक्षा कड़ी कर दी गई और पुलिस बल को सतर्क रहने के आदेश दिए गए ।

मीडिया पर सेंसरशिप लागू

सरकार द्वारा जारी निर्देश में सभी अख़बारों और मीडिया संस्थानों को सूचित किया गया कि अब कोई भी समाचार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रकाशित या प्रसारित नहीं किया जा सकेगा। कई प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने रिक्त स्थान या काली पट्टियों से भरे नजर आए। सूत्रों के अनुसार, कुछ अखबारों के संपादकों को आधी रात को ही चेतावनी दी गई थी कि वे सरकार के खिलाफ कोई सामग्री न छापें।

जनता में खामोशी, सड़कों पर सन्नाटा

आपातकाल की खबर फैलते ही राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में एक प्रकार की खामोशी और भय का माहौल देखा गया।
अधिकांश लोग आशंकित थे कि आने वाले दिनों में क्या होगा। सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस गश्त बढ़ा दी गई। कई शिक्षण संस्थानों और यूनिवर्सिटियों को बंद करने के आदेश दिए जा चुके थे ।

यह भी पढ़ें

लोकतंत्र की वापसी

भारत में 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल लगभग 21 महीने तक चला और 21 मार्च 1977 को समाप्त हुआ। इस पूरे दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे अंधकारमय काल माना गया। लेकिन इसका अंत एक ऐतिहासिक चुनाव और जनमत की ताकत के ज़रिए हुआ, जिसने साबित कर दिया कि लोकतंत्र दब तो सकता है, मिट नहीं सकता।

लोकतांत्रिक दबाव और असंतोष में वृद्धि:

जैसे-जैसे समय बीतता गया, सरकार की नीतियों—जैसे प्रेस सेंसरशिप, विरोधियों की गिरफ्तारी, और जबरन नसबंदी अभियान—के खिलाफ देश में गुस्सा बढ़ने लगा। जनता के बीच असंतोष साफ झलकने लगा, भले ही खुलकर विरोध मुमकिन न था।

सुप्रीम कोर्ट और अंतरराष्ट्रीय आलोचना:

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी उस समय Habeas Corpus जैसे मौलिक अधिकारों को निलंबित करने पर चुप्पी साधी, जिससे जनता का न्यायपालिका से भरोसा कमजोर पड़ा। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठनों ने इमरजेंसी की आलोचना शुरू कर दी थी।

चुनावों की घोषणा (18 जनवरी 1977):

लगातार आलोचना और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अचानक 18 जनवरी 1977 को लोकसभा चुनावों की घोषणा कर दी। उनके मुताबिक, “देश में स्थिरता लौट चुकी है, और अब जनता से फिर जनादेश लिया जाएगा।”

आपातकाल की समाप्ति (21 मार्च 1977):

चुनावों की प्रक्रिया शुरू होते ही 21 मार्च 1977 को आधिकारिक रूप से इमरजेंसी समाप्त कर दी गई। इससे पहले इंदिरा गांधी ने 23 मार्च को सभी आपातकालीन आदेशों को वापस ले लिया।

1977 का चुनाव: जनता की निर्णायक भूमिका

चुनाव में जनता पार्टी के बैनर तले सभी विपक्षी दल एकजुट हुए — जैसे जनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी, लोकदल आदि।इंदिरा गांधी और कांग्रेस को उत्तर भारत में भारी विरोध का सामना करना पड़ा, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहाँ नसबंदी अभियान ने लोगों को आक्रोशित किया था।कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत से सरकार बनाई । मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

संपादकीय टिप्पणी:

“आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने की परीक्षा थी। देश ने एक लंबा अंधेरा दौर देखा, यह समय न केवल जश्न का है, बल्कि भविष्य के लिए सतर्क रहने का भी है।” 21 मार्च 1977 को सिर्फ आपातकाल का अंत नहीं हुआ, बल्कि यह दिन भारतीय इतिहास में जनता की शक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत के रूप में दर्ज हो गया।


Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.