Revanth Reddy,सुप्रीम कोर्ट (नई दिल्ली) का भवन (फाइल फोटो)। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ भाजपा (तेलंगाना इकाई) की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। भाजपा की यह याचिका तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दे रही थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा रेवंत रेड्डी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय को राजनीतिक झगड़े सुलझाने के मंच में नहीं बदला जाना चाहिए। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने टिप्पणी की कि यदि आप एक राजनेता हैं तो आपको ऐसी आलोचनाएँ सहने के लिए मजबूत (मोटी) चमड़ी रखनी चाहिए।
विवाद का संक्षिप्त विवरण
- शिकायत और आरोप – भाजपा की तेलंगाना इकाई के महासचिव करम वेंकटेश्वरलाऊ ने मई 2024 में रेवंत रेड्डी के खिलाफ शिकायत दर्ज की। आरोप था कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बदनाम करते हुए कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो वह आरक्षण समाप्त कर देगी।
- निचली अदालत में सुनवाई – हैदराबाद की एक निचली अदालत में अगस्त 2024 में प्रारंभिक सुनवाई में पाया गया कि रेवंत रेड्डी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) की धारा 125 के तहत मानहानि का प्रथम दृष्टया मामला बनता है। धारा 125 चुनाव के दौरान विभिन्न वर्गों के बीच दुश्मनी फैलाने से संबंधित अपराधों को कवर करती है। Revanth Reddy ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और तर्क दिया कि राजनीतिक भाषणों को मानहानि का विषय नहीं बनाया जा सकता।
- हाई कोर्ट का फैसला – तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 1 अगस्त 2025 को Revanth Reddy की याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय ने कहा कि शिकायतकर्ता भाजपा की राष्ट्रीय इकाई का अधिकृत प्रतिनिधि नहीं था, इसलिए शिकायत विचारणीय नहीं थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीतिक भाषण अक्सर अतिशयोक्ति से भरे होते हैं और उन्हें मानहानिपूर्ण बताना स्वयं एक अतिशयोक्ति होगी। इन तर्कों के आधार पर हाई कोर्ट ने मानहानि मामले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई 8 सितंबर 2025 को चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हुई। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘इस अदालत का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई के लिए न करें’ और भाजपा की याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस गवई ने यह टिप्पणी भी की कि “अगर आप एक राजनेता हैं तो आपको इस सब को सहने के लिए मोटी चमड़ी रखनी चाहिए”। इन टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक बयानबाज़ी या चुनावी भाषण के मामलों में दखल देने से बचती है और नेताओं को आलोचनाएँ बर्दाश्त करने के लिए तैयार रहने की सलाह देती है।
फैसले का महत्व
तेलंगाना उच्च न्यायालय के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक राजनीतिक बहस में नेताओं को आलोचनाएँ सहने के लिए तैयार रहना होगा। उच्च न्यायालय ने पहले ही रेखांकित किया था कि राजनीतिक भाषणों में अक्सर अतिशयोक्ता (बढ़ा-चढ़ाकर) प्रस्तुतियाँ होती हैं और इन्हें मानहानिकारक ठहराना स्वयं अतिशयोक्ति है। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत की पुष्टि करते हुए कहा कि राजनीतिक विवादों के निस्तारण के लिए सर्वोच्च न्यायालय उपयुक्त मंच नहीं है। चीफ जस्टिस की ‘मोटी चमड़ी’ वाली टिप्पणी ने यह संकेत दिया कि लोकतंत्र में नेताओं को तेज आलोचनाओं को बर्दाश्त करने के लिए सक्षम होना चाहिए। कुल मिलाकर, इस फैसले से यह संदेश जाता है कि राजनेतिक रुख की आलोचना या विवाद के लिए सीधी कानूनी लड़ाई की बजाय राजनीतिक मंथन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और अदालतें केवल सीमित स्थितियों में ही ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करेंगी।