US-Iran Peace Talks 2026 ने वैश्विक राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। इस बीच कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor का बयान चर्चा में है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका और भारत की कूटनीतिक स्थिति पर अहम टिप्पणी की है।
US-Iran Peace Talks 2026 क्या है पूरा मामला?
United States और Iran के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान की राजधानी Islamabad में उच्चस्तरीय शांति वार्ता शुरू हुई है। यह वार्ता 1979 के बाद दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष बातचीत मानी जा रही है।
इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य 2026 में छिड़े संघर्ष को समाप्त करना, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को खोलना और क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करना है।
US-Iran Peace Talks 2026 में पाकिस्तान की अहम भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया में Pakistan एक मध्यस्थ (mediator) के रूप में उभरकर सामने आया है। पाकिस्तान ने न केवल वार्ता की मेजबानी की बल्कि दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और क्षेत्रीय संबंधों ने उसे इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाया है।
शशि थरूर का बयान: भारत के लिए चेतावनी
Shashi Tharoor ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर तंज कसते हुए कहा कि “ऐसी भूमिका वही देश निभा सकता है जिसके अपने हित जुड़े हों।”
हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि भारत को इस प्रक्रिया से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने हितों पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि:
- भारत को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में निष्क्रिय (passive) नहीं रहना चाहिए
- अगर भारत अलग-थलग पड़ता है, तो इससे उसके रणनीतिक और आर्थिक हित प्रभावित हो सकते हैं
- खासकर जब लाखों भारतीय खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं और ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत ने फिलहाल इस पूरे संघर्ष में संतुलित और तटस्थ रुख अपनाया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि:
- पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता भारत के लिए चुनौती बन सकती है
- मध्य पूर्व में भारत के हित (तेल, प्रवासी भारतीय) सीधे प्रभावित होते हैं
- ऐसे में भारत को वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका मजबूत करनी होगी
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर देश के भीतर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है।कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे भारत की विदेश नीति के लिए झटका बताया, जबकि Shashi Tharoor ने इस आलोचना को खारिज करते हुए भारत को “जिम्मेदार हितधारक” बताया।