Aravalli Case: भारत की पुरानी और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण अरावली पहाड़ियों से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की सुर्खियों में है। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने 20 नवंबर 2025 के अपने ही आदेश को फिलहाल रोक दिया (abeyance) और कहा कि अरावली की नई परिभाषा को लागू करने से पहले वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आधार पर विस्तृत समीक्षा जरूरी है।
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो दिल्ली से हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है और एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक ढाल का काम करती है। यह न केवल रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है, बल्कि जल संचयन, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखती है।
क्या था विवाद? ‘100-मीटर नियम’
इस विवाद की शुरुआत नवंबर 2025 में उस फैसले से हुई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई एक तकनीकी समिति की सिफारिश को मान्यता दी थी। इस सिफारिश के तहत अरावली को उस इलाके की स्थानीय ऊँचाई से कम से कम 100-मीटर ऊपर उठने वाले भू-आकृतियों (landforms) के रूप में परिभाषित किया गया। यदि दो या दो से अधिक ऐसे 100-मीटर से ऊँचे पहाड़ 500 मीटर की दूरी के भीतर हैं, तो वह “Aravalli Range” मानी जाएगी।
हालाँकि, यह परिभाषा बहुत विवादित साबित हुई। पर्यावरण विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और कई वैज्ञानिकों ने कहा कि इस कठोर 100-मीटर -आधारित नियम से लगभग 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है, क्योंकि उन क्षेत्रों में छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, ढलान और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण भू-आकृतियाँ शामिल हैं।
पर्यावरणीय और सामाजिक चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली का पारिस्थितिक तंत्र सिर्फ ऊँचाई पर आधारित नहीं है। छोटी-छोटी पहाड़ियाँ और ढलान भूजल रिचार्ज, वायु गुणवत्ता नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण काम करते हैं। इसका अनदेखा होना पूरे क्षेत्र को खनन, भूमि विकास और निर्माण परियोजनाओं के लिए खुला छोड़ सकता है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का खतरा है।
राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के पर्यावरण कार्यकर्ता और राजनीतिक दलों ने इस फैसले के खिलाफ व्यापक प्रतिक्रिया जताई। कुछ क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन भी हुए, जिसमें आर्कियोलॉजी और पारंपरिक पहाड़ों के संरक्षण की माँग की गई।
सुप्रीम कोर्ट का नया रुख
29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष पीठ (Chief Justice Surya Kant सहित) ने अपने ही आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया, और कहा कि इस मामले में गंभीर वैज्ञानिक और तकनीकी सवाल उठ रहे हैं, जिनका समाधान किए बिना कोई कड़े नियम लागू नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने कहा कि पहले की परिभाषा और रिपोर्ट में कुछ अहम बिंदुओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, जिससे गलत व्याख्या और पर्यावरण संबंधी जोखिम हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अरावली की परिभाषा को केवल ऊँचाई के आधार पर सीमित करना” शायद पर्याप्त नहीं है और इससे बड़े हिस्सों को संरक्षण से बाहर किया जा सकता है। इसलिए कोर्ट ने एक नई, उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति (high-powered expert panel) बनाने का निर्देश दिया है ताकि वैज्ञानिक और भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहतर समीक्षा हो सके।
कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस
इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात सरकारों को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 के लिए निर्धारित की है। अदालत ने यह भी कहा है कि बिना नए रिव्यू के कोई भी बड़ा कदम न उठाया जाए, जैसे खनन अनुमतियों को आगे बढ़ाना या परियोजनाओं को अनुमोदित करना।
आगे क्या?
इस फैसले का मतलब यह है कि पहले किए गए निर्णय पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा, और पर्यावरण-सुरक्षा मानदंडों पर व्यापक समीक्षा के बाद ही कोई अंतिम निर्णय आएगा। कोर्ट का रुख दर्शाता है कि विधिगत फैसलों में वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सामाजिक पहलुओं को समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए, खासकर तब जब मामला एक पुरानी और संवेदनशील पारिस्थितिक प्रणाली से जुड़ा हो।
अरावली पहाड़ियाँ सिर्फ भू-आकृतियाँ नहीं हैं — वे भारत के प्राकृतिक संरक्षण, जल संसाधन और पारिस्थितिक संतुलन की एक महत्वपूर्ण ढाल हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह मौजूदा कदम पर्यावरण न्याय के दृष्टिकोण से एक गंभीर संकेत माना जा रहा है कि संरक्षण और विकास दोनों को संतुलित करने के लिए वैज्ञानिक समीक्षा जरूरी है।
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