अयोध्या में आज का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज का भव्य ध्वजारोहण किया गया। यह क्षण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि करोड़ों रामभक्तों के वर्षों पुराने स्वप्न का साकार रूप था। मंदिर निर्माण पूर्णता की ओर बढ़ते हुए इस ध्वजारोहण ने आध्यात्मिक उत्सव का माहौल बना दिया।
ध्वजारोहण का महत्व

राम मंदिर में ध्वजारोहण उस पवित्र परंपरा का हिस्सा है जो मंदिर को आध्यात्मिक रूप से सक्रिय मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धर्म ध्वज शौर्य, धर्म, समृद्धि और दिव्यता का प्रतीक होता है।
मंदिर के मुख्य शिखर पर लगाया गया यह केसरिया ध्वज लगभग 22×11 फीट का है, जिसमें सूर्य, ॐ, और कोविदार वृक्ष के शुभ प्रतीक अंकित हैं। ये चिन्ह रामलला के सूर्यवंशी वंश, सृष्टि की मूल ध्वनि और पवित्रता के भाव को दर्शाते हैं।
ध्वज को 42 फीट ऊँचे पोल पर स्थापित किया गया, जिसकी विशेष संरचना इसे तेज़ हवाओं और बरसात से सुरक्षित रखती है। यह दृढ़ता और आस्था का प्रतीक माना जा रहा है।
विवाह पंचमी और अभिजीत मुहूर्त का शुभ संयोग
ध्वजारोहण का आयोजन विवाह पंचमी के पावन पर्व पर किया गया, जिसे भगवान राम और माता सीता के दिव्य विवाह दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अभिजीत मुहूर्त में किए गए इस अनुष्ठान ने कार्यक्रम की धार्मिक महत्ता को कई गुना बढ़ा दिया।
जय श्रीराम के हुंकारों से गूँज उठी पूरी अयोध्या
जैसे ही ध्वज मंदिर के शिखर पर उच्चतम बिंदु तक पहुँचा, पूरा वातावरण श्रद्धा और भक्ति से भर गया।
“जय श्रीराम! जय श्रीराम!” के गगनभेदी नारे पूरे अयोध्या में गूँजते रहे।
रामलला के दर्शनों के लिए उमड़े लाखों श्रद्धालुओं की आवाज मिलकर ऐसा वातावरण बना रही थी मानो पूरी नगरी दिव्य ऊर्जा से स्पंदित हो रही हो।
मंदिर परिसर से लेकर सरयू तट और शहर की गलियों तक, हर दिशा में रामनाम की प्रतिध्वनि सुनाई दे रही थी। लोगों के चेहरे पर उत्साह, आँखों में भक्ति और माहौल में अद्भुत आध्यात्मिक उर्जा अनुभव की गई।
ऐतिहासिक क्षण की झलक
- मंदिर का लगभग पूर्ण निर्माण
- पहली बार भव्य शिखर पर केसरिया धर्म ध्वज
- धार्मिक परंपराओं के अनुरूप विस्तृत वैदिक अनुष्ठान
- लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति
- सुरक्षा और व्यवस्थाओं के बीच शांत, गरिमामय वातावरण
समापन
अयोध्या राम मंदिर में ध्वजारोहण, अयोध्या में ध्वजारोहण का यह क्षण केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के पुनर्जागरण का संदेश था। “जय श्रीराम” की यह गूँज इतिहास में दर्ज हो गई है और आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व का क्षण बन चुकी है।