Suposhit Madhya Pradesh,सुपोषण का सरकारी सपना हुआ कागज़ी।अस्पतालों में बच्चों के लिए जगह कम, मौतों पर बयानबाज़ी ज़्यादा – सवालों के घेरे में ‘सुपोषित मध्य प्रदेश’।
10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित, 45 जिले रेड ज़ोन में
मध्य प्रदेश में कुपोषण की मार झेलते बच्चों की मौतें लगातार सामने आ रही हैं। बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार और अफसरशाही की हकीकत ये है कि जिन मासूमों को गोद में खेलने चाहिए थे, वे पोषण आहार और इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।
जिंदा आंकड़े, मरते बच्चे
शिवपुरी की 15 महीने की बच्ची दिव्यांशी का वजन महज़ 3.7 किलो था। इतनी उम्र में जब बच्चे चलना सीखते हैं, दिव्यांशी सांस लेने के लिए भी संघर्ष करती रही और अंत में दम तोड़ दिया। श्योपुर की राधिका, डेढ़ साल की, उसका वजन केवल 2.5 किलो निकला। जी हाँ, ये उसी प्रदेश की तस्वीर है जहाँ करोड़ों रुपये “पोषण अभियान” पर खर्च हो चुके हैं।
भिंड जिले में भी एक मासूम चला गया। अधिकारी सफाई देते रहे – “कुपोषण नहीं, बीमारी थी।” सवाल ये है कि आखिर हर बच्चा क्यों “बीमार” पड़ रहा है?
कुपोषण का साम्राज्य: आधे से ज्यादा जिले रेड ज़ोन में
प्रदेश के 55 में से 45 जिले रेड जोन में हैं। यानी 20% से ज्यादा बच्चे उम्र के हिसाब से कम वजन वाले। सरकार के पोषण ट्रैकिंग सिस्टम खुद बता रहे हैं कि 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषितहैं और इनमें से करीब 1.36 लाख बच्चे गंभीर हालत मेंहैं। यह तब है जब मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक “Suposhit Madhya Pradesh” का नारा बुलंद कर रहे हैं।
दतिया का हाल: बच्चों से भरे अस्पताल, जगह नहीं बची
दतिया जिले में हाल ही में वजन-मापन में पता चला कि 400 से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण से पीड़ित हैं। अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) इतने भरे पड़े हैं कि अब बच्चों को रखने के लिए वयस्कों के वार्ड तक का सहारा लिया जा रहा है। सोचिए, अस्पतालों में बच्चे तो हैं, पर पोषण नहीं।
आंकड़ों का खेल और अदालत का हस्तक्षेप
कुपोषण की खबरें जब राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बनने लगीं तो अब अदालत को बीच में आना पड़ा। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा है कि हर जिले में कितने बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं, उसकी रिपोर्ट चार हफ्ते में दी जाए। यानी सरकार खुद नहीं बता पा रही कि उसके “Suposhit Madhya Pradesh अभियान” का असली हाल क्या है।
मलवा-निमाड़: मंत्री के इलाके में ही कुपोषण का साम्राज्य
प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री के अपने इलाके मलवा-निमाड़ के हालात देखिए—धार जिले में 42% बच्चे कम वजन के, खरगोन में 36%, बड़वानी में 36%। ये आंकड़े किसी पिछड़े राज्य के नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के हैं, जहाँ मंत्री जी खुद पोषण का जिम्मा संभाल रही हैं।
व्यंग्य में सच्चाई
सरकार कागज़ पर योजनाओं के ढेर लगा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि बच्चे अब भी दूध और दवा के अभाव में मर रहे हैं। हर मौत के बाद मंत्री-अधिकारी बयान देते हैं, रिपोर्ट बनती है, फाइलें घूमती हैं और मामला दफन हो जाता है। सवाल यही है—क्या मासूमों की मौत सिर्फ़ आंकड़े भर हैं या ये सिस्टम की लापरवाही का सबूत भी है..?