कर्नाटक कांग्रेस में पावर टसल,कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के समर्थक विधायकों का तीसरा समूह दिल्ली पहुंच चुका है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि पावर-शेयरिंग समझौते के मुद्दे पर दबाव की राजनीति अब और तेज हो गई है।
पावर-शेयरिंग का विवाद: पुरानी कहानी का नया दौर
कांग्रेस ने 2023 में सत्ता संभालते समय कथित रूप से एक समझौता किया था कि दो-ढाई साल बाद मुख्यमंत्री पद रोटेट होगा।
हालांकि इस समझौते को कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन शिवकुमार गुट लगातार दावा करता रहा है कि यह मौखिक वादा था।
सिद्धारमैया के समर्थक इस समझौते को “अफवाह” बताते हैं और मौजूदा नेतृत्व को स्थिर बनाए रखने की दलील देते हैं।
तीसरा बैच दिल्ली में — क्या संकेत?
शिवकुमार समर्थक करीब 6–8 विधायक का तीसरा दल दिल्ली पहुंचा है, जिसका मकसद हाईकमान से मिलकर पावर-शेयरिंग फॉर्मूले पर चर्चा को मजबूती देना है।
इससे पहले दो बैच दिल्ली जा चुके हैं।
यह एक सुनियोजित रणनीति मानी जा रही है जिसमें बार-बार ग्रुप भेजकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ाया जा रहा है।
विधायक यह तर्क दे रहे हैं कि “अगर वादा किया गया था, तो अब उसे लागू करने का समय है।”
हाईकमान की स्थिति और सिद्धारमैया गुट की चालें
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस समय बेंगलुरु में हैं और लगातार वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी अपने कार्यक्रमों को बदला है और उन्होंने अपने करीबी मंत्रियों के साथ रणनीतिक मीटिंग्स की हैं।
दूसरी ओर, शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से गुटबाजी से इनकार किया है, लेकिन उनके समर्थन में विधायकों की सक्रियता सब कुछ साफ कर देती है।
गुटबाज़ी का बढ़ता असर
- सत्ता की स्थिरता पर सवाल
नेतृत्व संघर्ष सरकार की स्थिरता पर असर डाल सकता है, खासकर तब जब कांग्रेस राज्य में मजबूत जनादेश के साथ सत्ता में लौटी थी। - संगठन के लिए चुनौती
लगातार दिल्ली यात्राएँ यह संकेत देती हैं कि पार्टी के अंदर संवाद की कमी किसी बड़े विवाद में बदल सकती है। - विपक्ष को अवसर
बीजेपी पहले ही इसे “कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी” बताकर राज्य में प्रचार की रणनीति तेज कर रही है।
नया टॉपिक: आगे की संभावित राजनीतिक तस्वीर
कर्नाटक में स्थितियाँ जिस दिशा में बढ़ रही हैं, उससे कई संभावित परिदृश्य उभरते दिख रहे हैं:
- मुख्यमंत्री पद का रोटेशन लागू हो सकता है
यदि हाईकमान दबाव में आता है, तो दो-ढाई साल बाद मुख्यमंत्री पद शिवकुमार को सौंपने का फार्मूला लागू किया जा सकता है।
यह कांग्रेस के लिए जोखिम भरा लेकिन संतुलन बनाए रखने वाला कदम होगा।
- समझौता फेल होने पर बड़ा राजनीतिक भूकंप संभव
अगर हाईकमान यह मांग नहीं मानता, तो
विधायकों की खुली बगावत,
सत्ता अस्थिर होने,
या नेतृत्व परिवर्तन जैसी स्थितियाँ भी सामने आ सकती हैं।
- हाईकमान दोनों गुटों के बीच ‘मध्य मार्ग’ ढूंढ सकता है
एक और संभावना यह है कि हाईकमान
कैबिनेट विस्तार,
बड़े मंत्रालयों का पुनर्वितरण,
या संगठन में बड़े पद देकर शिवकुमार को संतुष्ट करने की कोशिश करे।
- राजनीतिक संदेश पूरे देश में जाएगा
कर्नाटक कांग्रेस में पावर टसल, कर्नाटक दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत राज्य है, इसलिए यहां की अस्थिरता का राष्ट्रीय प्रभाव भी हो सकता है — खासकर 2026 के चुनावों से पहले।