Renaming Of Kerela: केरल से “केरलम” तक नाम बदलने की पूरी कहानी

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By Akanksha Singh Baghel

Renaming of Kerela,24 फरवरी 2026 को भारत की केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैसला किया है कि दक्षिण भारत का राज्य केरल का नाम आधिकारिक तौर पर “केरलम” कर दिया जाएगा। यह निर्णय राज्य सरकार की मांग और विधान सभा के प्रस्ताव के बाद लिया गया है, और अब इसे संविधान में संशोधन के लिए आगे भेजा जाएगा।


Renaming of Kerela “केरलम” नाम बदलने की प्रक्रिया की शुरुआत केरल राज्य सरकार ने की थी। राज्य मंत्रिमंडल ने पहले इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दी, जिसके बाद इसे केरल विधानसभा में पारित किया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत, किसी भी राज्य का नाम बदलने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति आवश्यक होती है। केंद्र की मंज़ूरी मिलने के बाद यह प्रस्ताव संसद में विधेयक के रूप में पेश किया जाता है, और दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति से नाम आधिकारिक रूप से बदल जाता है। इस तरह कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से केरल से केरलम का बदलाव किया गया।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को “केरल” नाम को बदलकर “केरलम” करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब यह प्रस्ताव केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 के रूप में पहले राज्य विधानसभा को भेजा जाएगा। उसके बाद राष्ट्रपति की सिफारिश पर यह संसद में पेश किया जाएगा और पारित होने पर नाम आधिकारिक रूप से बदल जाएगा।

भाषाई और सांस्कृतिक पहचानकेरल राज्य का नाम मलयालम भाषा में हमेशा केरलम ही रहा है। समर्थकों का मानना है कि “Kerala” अंग्रेज़ी रूप है जबकि वास्तविक स्थानीय नाम Keralam है। इस बदलाव से स्थानीय भाषा और संस्कृति को सम्मान मिलेगा।

राज्य का गठन 1 नवंबर 1956 को भाषा के आधार पर हुआ था। “केरलम” शब्द का उपयोग स्थानीय लोगों ने लंबे समय से किया है, और अब इसे संविधान में भी उसी रूप में स्थान देना चाहा जा रहा है।

राज्य विधानसभा की राय अब राष्ट्रपति यह विधेयक राज्य विधानसभा तक भेजेंगे ताकि वह अपनी राय दे सके।संसद में प्रस्ताव

विधानसभा की राय मिलने के बाद, संसद में विधेयक पेश किया जाएगा और पारित होने पर राज्य का नाम आधिकारिक रूप से केरलम हो जायेगा।नवीन दस्तावेज़ और पहचान – नाम बदलने के बाद सरकारी दस्तावेज़ों और संस्थानों में भी नए नाम का उपयोग धीरे-धीरे शुरू होगा।

इस फैसले को कुछ नेताओं ने भाषाई सम्मान और संस्कृति को मान्यता देने वाला कदम बताया है। वहीं कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि अन्य राज्यों की नाम बदलाव मांगों पर समान व्यवहार क्यों नहीं किया जाता। उदा., पश्चिम बंगाल का नाम बांग्ला करने की बात वर्षों से चली आ रही है लेकिन उस पर अभी तक कोई मंजूरी नहीं मिली है, इस पर राजनीति भी हुई है।

अधिकतर विश्लेषकों की राय है कि यह बदलाव प्रशासन या शासन व्यवस्था को प्रभावित नहीं करेगा — यह अधिकतर संस्कृति और पहचान का प्रतीकात्मक निर्णय है। दस्तावेज़ों और कानूनी पहचान में नाम बदलने के लिए पहले संविधान संशोधन होना आवश्यक है।

आम जनता और राजनीति में यह भी चर्चा चल रही है कि नाम बदलने के बाद लोगों को क्या इस राज्य के निवासी के लिए नया शब्द मिलेगा — जैसे अंग्रेज़ी में Keralite या कुछ और। कुछ नेताओं ने इस बारे में मजाकिया सवाल भी उठाये हैं।

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